मुस्लिम समुदाय के जानकारों ने बताया Lockdown 4.0 में कैसे मनाएं EID

रमजान के बाद आने वाली ईद की नमाज का पूरा तरीका अलग होता है क्योंकि दूसरी नमाजों से अलग होती है ईद की नमाज जुमे की नमाज की तुलना में ईद की नमाज में 6 ज्यादा तकबीरात (अल्लाहु अकबर) होती है, पूरी नमाज के 5 मुख्य हिस्से होते हैंमुस्लिम समुदाय के जानकारों ने बताया Lockdown 4.0 में कैसे मनाएं EID

  • रमजान के बाद आने वाली ईद की नमाज का पूरा तरीका अलग होता है क्योंकि दूसरी नमाजों से अलग होती है ईद की नमाज
  • जुमे की नमाज की तुलना में ईद की नमाज में 6 ज्यादा तकबीरात (अल्लाहु अकबर) होती है, पूरी नमाज के 5 मुख्य हिस्से होते हैं

देश में Lockdown 4.0 लागु है। Home Ministry की Guidlines के तहत कोई भी धार्मिक स्थल यानी मंदिर हो, मस्जिद हो या गुरुद्वारा, कुछ नहीं खुलेगा। ऐसे में किसी को ईदगाह या मस्जिद में जमा होने की इजाजत भी नहीं मिलेगी। ऐसे में हमने मुस्लिम समुदाय के कुछ जिम्मेदार लोगों से बात की तो उन्होंने ईद मनाने को लेकर तमाम सलाह दी हैं। इस रिपोर्ट में हम उनका जिक्र करेंगे। साथ ही, बताएंगे कि आप ईद के लिए खरीदारी कैसे करें और किन-किन बातों का ख्याल रखें।

 

लॉकडाउन के निर्देशों का पालन करें मुफ्ती महमूदउल हसन बुलंदशहरी के नेतृत्व की खंडपीठ में शामिल मुफ्ती हबीबुर्रहमान खैराबादी, मुफ्ती वकार अली, मुफ्ती नोमान सीतापुरी, मुफ्ती जैनुल इस्लाम और मुफ्ती फखरुल इस्लाम की खंडपीठ ने जारी फतवे में कहा कि ईद की नमाज तक लॉकडाउन जारी रहने की सूरत में जिस तरह लॉकडाउन में नमाज-ए-जुमा शासन-प्रशासन के निर्देशानुसार मस्जिद या घरों में (पांच-पांच लोगों द्वारा)अदा की जा सकती है। नमाज-ए-ईद की माफी भी होगी फतवे में सलाह देते हुए कहा कि जो लोग किसी मजबूरी के तहत ईद की नमाज अदा नहीं कर पाएंगे, उनके लिए नमाज-ए-ईद माफ होगी। मुफ्ती-ए-कराम ने कहा कि अगर ईद-उल-फितर की नमाज अदा करने में जमात का प्रबंध नहीं हो पाता तो अपने ही घरों में रहकर दो या चार रकाअत नमाज-ए-नफल चाश्त की अदा करना बेहतर है। नमाज-ए-चाश्त यह नमाज उस वक्त अदा की जाती है, जब सूरज खूब ऊंचाई पर पहुंचने लगता है। यह समय प्रात: 10 बजे से 11 बजे का वक्त होता है। उलेमा के मुताबिक इसमें दो से लेकर चार रकाअत तक पढ़ी जा सकती हैं। लाकडाउन के कारण पहली बार ऐसा हो रहा है कि ईदगाह पर ईद की नमाज नहीं हो पाएगी। जमात (पांच लोग या इससे अधिक) नहीं हो पाने की स्थिति में ही उलेमा ने नमाज-ए-चाश्त पढने की भी सलाह दी है।

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